Spread the loveदेहरादून/काठमांडू। हिमालय एक बार फिर कांपा है, और इस बार कांपने की वजह कोई भूकंप नहीं, बल्कि आसमान से गिरा बर्फ का एक पहाड़ है। नेपाल और चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र की सीमा पर 26 अगस्त की सुबह जो हुआ, उसने 2013 की केदारनाथ त्रासदी और 2021 की चमोली आपदा की यादें ताजा कर दी हैं। अभी तक की आधिकारिक खबरों के मुताबिक 359 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है और 1000 से ज्यादा लोग लापता हैं। मरने वालों का आंकड़ा हर घंटे बढ़ रहा है, क्योंकि कई गांवों तक अभी भी रेस्क्यू टीमें नहीं पहुंच पाई हैं। 1. कैसे शुरू हुई प्रलय? सैटेलाइट ने खोला राज शुरुआत में लगा कि यह भारी बारिश से आई बाढ़ है, लेकिन रॉयटर्स की रिपोर्ट और Planet Labs की सैटेलाइट तस्वीरों ने पूरी कहानी बदल दी। एक्सपर्ट्स के मुताबिक ग्लेशियर का निचला हिस्सा अचानक टूटकर सैकड़ों मीटर नीचे घाटी में गिर गया। अमेरिका की भूवैज्ञानिक एजेंसी USGS ने भी पुष्टि की है कि ग्लेशियर के गिरने से भूकंपीय गतिविधि (Seismic Activity) दर्ज की गई और इसके “विनाशकारी” परिणाम सामने आए। USGS ने साफ कहा कि यह कोई भूकंप नहीं था, बल्कि ग्लेशियर के गिरने का झटका था। टूटने के बाद क्या हुआ? बर्फ, चट्टान और कीचड़ की एक विशाल दीवार Lhende Khola नदी में समा गई। यह मलबा इतनी तेजी से बहा कि 60 मील से ज्यादा दूरी तक तबाही मचाता चला गया। यह दीवार सबसे पहले तिब्बत के ग्यिरोंग पोर्ट (Gyirong Port) से टकराई, जो नेपाल और चीन के बीच एक प्रमुख व्यापारिक मार्ग है, और फिर नेपाल में प्रवेश कर गई। नेपाल में घुसते ही इसने भोटेकोशी और त्रिशुली नदी का रूप ले लिया। नतीजा – त्रिशुली बाजार, नुवाकोट जिले के गांव, सड़कें, पुल और कई हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स पूरी तरह से बह गए। AP की ड्रोन तस्वीरों में त्रिशुली में घर मिट्टी में दबे और अधडूबे नजर आ रहे हैं। 2. आंकड़ा क्यों बढ़ रहा है? 1000 से ज्यादा लापता यह सिर्फ एक बाढ़ नहीं, बल्कि एक बहु-स्तरीय आपदा है। रेस्क्यू टीमों को मलबे से भरी घाटियों में शवों को खोजना पड़ रहा है। शुरुआती रिपोर्ट में 95 मौतों की बात थी, जो शाम तक 160 और अब 359 तक पहुंच गई है। 1000 से ज्यादा लोगों के लापता होने की वजह यह है कि यह मार्ग काठमांडू से ल्हासा को जोड़ने वाला लोकप्रिय तीर्थ और पर्यटन मार्ग है। यहां सैकड़ों पर्यटक और ट्रक ड्राइवर फंसे थे। रॉयटर्स के मुताबिक सैकड़ों पर्यटक लापता हैं, जिनमें भारतीय भी शामिल हैं। न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक कोलकाता से 21 अगस्त को गए 32 पर्यटकों का एक जत्था, जिसमें एक अमेरिका में बसा भारतीय भी है, लापता है। 3. क्या यह अकेली घटना है? नहीं, 47 झीलें और खतरे में वैज्ञानिकों के लिए यह आश्चर्य नहीं है। ICIMOD (International Centre for Integrated Mountain Development) और नेपाल सरकार के ताजा आकलन में नेपाल में 47 ग्लेशियर झीलों को अतिखतरनाक (Potentially Dangerous Glacial Lakes – PDGLs) घोषित किया गया है। इन झीलों में कभी भी GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) आ सकता है। पिछले साल जुलाई 2025 में भी इसी भोटेकोशी नदी पर तिब्बत की एक ग्लेशियर झील फटने से बाढ़ आई थी। यानी यह क्षेत्र लगातार कमजोर हो रहा है। ग्लोबल वार्मिंग से ग्लेशियर पिघल रहे हैं और नई झीलें बन रही हैं, जो कभी भी फट सकती हैं। 4. उत्तराखंड पर क्या असर? शारदा नदी पर हाई अलर्ट नेपाल में बाढ़ का सीधा असर उत्तराखंड के सीमांत जिले चंपावत पर पड़ा है। नेपाल में तबाही के बाद उत्तराखंड के सीमांत जिले चंपावत में सतर्कता बढ़ा दी गई है। राज्य आपदा मोचन बल (SDRF) की तनकपुर पोस्ट को हाई अलर्ट पर रखा गया है। SDRF की टीमें शारदा घाट और शारदा बैराज के आसपास संवेदनशील इलाकों में गश्त और जलस्तर की निगरानी कर रही हैं। लोगों, यात्रियों और मछुआरों से शारदा नदी के किनारों से दूर रहने की अपील की गई है। इतना ही नहीं, केंद्र सरकार ने बिहार, यूपी और उत्तराखंड में गंडक नदी पर भी अगले 24 घंटे को सबसे अहम बताते हुए अलर्ट जारी किया है। उत्तराखंड सरकार ने नेपाल में फंसे लोगों के लिए SEOC हेल्पलाइन नंबर जारी किए हैं – 0135-2710334, 2710335, 2664314, 2664315, 2664316। भारत ने नेपाल को पहली खेप की मानवीय सहायता भी भेज दी है। 5. दुनिया की सबसे घातक ग्लेशियर आपदाओं में एक रॉयटर्स ने इसे दुनिया की सबसे घातक ग्लेशियर आपदाओं में से एक बताया है। हिमालय में ऐसी आपदाएं अब सामान्य हो रही हैं। वैज्ञानिक कह रहे हैं कि हिमालय में ग्लेशियरों का पिघलना 10 साल पहले के अनुमान से दोगुनी गति से हो रहा है। नेपाल में 39 लोगों की मौत भूस्खलन और बाढ़ से अलग-अलग जगहों पर पहले ही हो चुकी थी, लेकिन यह GLOF घटना उससे कई गुना बड़ी है। निष्कर्ष: चेतावनी है यह आपदा नेपाल की यह घटना सिर्फ नेपाल की नहीं, बल्कि पूरे हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र के लिए चेतावनी है। उत्तराखंड में भी 200 से ज्यादा ग्लेशियर झीलें हैं, जिनमें से 13 को खतरनाक माना गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पहले ही ग्लेशियर झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने के निर्देश दिए हैं, लेकिन नेपाल की घटना ने दिखा दिया है कि हमें कितनी तेजी से काम करना होगा। अभी रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है, हेलीकॉप्टर पानी उतरने का इंतजार कर रहे हैं। अगले 24 घंटे सबसे अहम हैं, क्योंकि भोटेकोशी नदी में एक और बाढ़ की चेतावनी जारी की गई है। Post Views: 23 Post navigation अंतरराष्ट्रीय समाचार: दुनिया भर में बढ़ा तनाव, कई देशों में बड़े घटनाक्रम रूस-यूक्रेन युद्ध 1000 दिनों के पार: 9 शहरों पर सबसे बड़ी बमबारी, ब्रिटेन को रूस की सीधी चेतावनी – “हमारे सैन्य अड्डे निशाने पर”