₹16 करोड़ का पुल 16 दिन में सवालों के घेरे में: नंदा की चौकी पुल की एप्रोच रोड धंसी, PWD के 3 इंजीनियर निलंबित
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देहरादून | देहरादून के नंदा की चौकी, प्रेमनगर क्षेत्र में टोंस नदी पर बने नए पुल की एप्रोच रोड धंसने के मामले में उत्तराखंड सरकार ने बड़ी कार्रवाई की है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सख्ती के बाद लोक निर्माण विभाग (PWD) के तीन इंजीनियरों को निलंबित कर दिया गया है। प्रारंभिक जांच में तकनीकी खामियां, डिजाइन से जुड़ी गड़बड़ियां और गुणवत्ता नियंत्रण में लापरवाही सामने आने के बाद यह कार्रवाई की गई।

निलंबित अधिकारियों में अधिशासी अभियंता राजेश कुमार, सहायक अभियंता अमित कुमार त्यागी और कनिष्ठ अभियंता नवीन गैरोला शामिल हैं।

₹16 करोड़ की लागत से बना था पुल

नंदा की चौकी के पास टोंस नदी पर बने इस पुल का निर्माण करीब 16 करोड़ रुपये की लागत से किया गया था। यह पुल पुराने देहरादून-पोंटा साहिब मार्ग पर यातायात के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

खास बात यह है कि इससे पहले सितंबर 2025 में पुराना पुल क्षतिग्रस्त हो गया था। इसके बाद नए पुल का निर्माण कराया गया। लंबे इंतजार के बाद 12 जुलाई 2026 को ही नए पुल को यातायात के लिए खोला गया था।

लेकिन उद्घाटन के महज कुछ ही दिनों बाद इसकी एप्रोच रोड ने निर्माण गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

28 जुलाई को धंस गई एप्रोच रोड

28 जुलाई 2026 की सुबह क्षेत्र में हुई भारी बारिश के बाद पुल की एप्रोच रोड का बड़ा हिस्सा धंस गया। सड़क के नीचे का हिस्सा खोखला हो गया और मार्ग पर यातायात प्रभावित हुआ।

एप्रोच रोड के इस तरह क्षतिग्रस्त होने के बाद निर्माण कार्य की गुणवत्ता और तकनीकी निगरानी को लेकर सवाल उठने लगे। मामला शासन तक पहुंचा और प्रारंभिक जांच के आदेश दिए गए।

जांच में सामने आई तकनीकी लापरवाही

प्रारंभिक जांच में अधिकारियों की ओर से निर्माण कार्य की पर्याप्त तकनीकी निगरानी नहीं किए जाने और ठेके की शर्तों का सही तरीके से पालन नहीं करवाने जैसी गंभीर कमियां सामने आने की बात कही गई है।

जांच में यह भी देखा गया कि निर्माण के दौरान डिजाइन और गुणवत्ता नियंत्रण से जुड़े निर्धारित मानकों का कितना पालन किया गया। इन खामियों के आधार पर संबंधित इंजीनियरों की जिम्मेदारी तय करते हुए निलंबन की कार्रवाई की गई।

तीन इंजीनियरों पर गिरी गाज

PWD सचिव पंकज कुमार पांडेय के आदेश के बाद तीन इंजीनियरों को निलंबित किया गया है।

निलंबित अधिकारी:

  • राजेश कुमार — अधिशासी अभियंता
  • अमित कुमार त्यागी — सहायक अभियंता
  • नवीन गैरोला — कनिष्ठ अभियंता

सरकार की इस कार्रवाई को निर्माण कार्यों में लापरवाही के खिलाफ सख्त संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।

सवाल: 16 दिन में कैसे सामने आई इतनी बड़ी खामी?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि करीब ₹16 करोड़ की लागत से तैयार किए गए पुल को 12 जुलाई को जनता के लिए खोला गया और महज 16 दिन बाद 28 जुलाई को उसकी एप्रोच रोड का बड़ा हिस्सा धंस गया।

बारिश को सड़क धंसने की तत्काल वजह माना जा रहा है, लेकिन इसके साथ ही यह जांच का विषय है कि एप्रोच रोड का निर्माण इस तरह क्यों नहीं किया गया कि वह सामान्य मानसूनी दबाव को सह सके।

यही वजह है कि अब निर्माण की गुणवत्ता, डिजाइन, ड्रेनेज व्यवस्था, मिट्टी की मजबूती और तकनीकी निगरानी समेत कई पहलुओं की जांच महत्वपूर्ण हो गई है।

ठेकेदार की भूमिका भी जांच के दायरे में

इंजीनियरों पर कार्रवाई के बाद अब निर्माण कार्य करने वाले ठेकेदार की भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। यह जांच महत्वपूर्ण होगी कि निर्माण में इस्तेमाल सामग्री निर्धारित मानकों के अनुरूप थी या नहीं और क्या ठेके की सभी शर्तों का पालन किया गया था।

अगर जांच में ठेकेदार की ओर से भी गंभीर अनियमितता सामने आती है, तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है।

सरकार के सामने बड़ी चुनौती

देहरादून और प्रेमनगर क्षेत्र के लिए यह पुल बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में सरकार के सामने दोहरी चुनौती है—एक ओर क्षतिग्रस्त एप्रोच रोड को सुरक्षित तरीके से दुरुस्त करना और दूसरी ओर यह सुनिश्चित करना कि दोबारा ऐसी स्थिति पैदा न हो।

सिर्फ सड़क की मरम्मत पर्याप्त नहीं होगी। निर्माण की तकनीकी गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों की स्वतंत्र जांच भी जरूरी होगी, ताकि जनता के पैसे से बने महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर दोबारा सवाल न उठें।

करारा सवाल

जब ₹16 करोड़ की लागत से बना पुल 12 जुलाई को ही यातायात के लिए खोला गया था, तो महज 16 दिन बाद उसकी एप्रोच रोड कैसे धंस गई?

भारी बारिश को कारण माना जा सकता है, लेकिन क्या निर्माण के समय मानसून और पहाड़ी क्षेत्र की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर पर्याप्त सुरक्षा और जल निकासी व्यवस्था की गई थी? अब जांच का सबसे अहम सवाल यही है।

सरकार ने तीन इंजीनियरों को निलंबित कर शुरुआती जिम्मेदारी तय कर दी है। अब लोगों की नजर इस बात पर है कि जांच में ठेकेदार और निर्माण एजेंसी की जिम्मेदारी कितनी तय होती है और पुल पर सुरक्षित यातायात कब तक पूरी तरह बहाल किया जाता है।

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