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दुबई/तेल अवीव/वॉशिंगटन। मध्य पूर्व एक बार फिर दुनिया की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा विस्फोटक पॉइंट बन गया है। अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध के 6 महीने बाद दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग Strait of Hormuz (हॉर्मुज जलडमरूमध्य) में व्यापार लगभग ठप हो गया है। एक तरफ जहाजों की आवाजाही 95% तक गिर गई है, तो दूसरी तरफ इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान पर लगाई गई कड़ी आर्थिक घेराबंदी की खुलकर सराहना की है।

1. हॉर्मुज में क्या हुआ? 100 से 5 जहाजों पर सिमटा व्यापार

हॉर्मुज जलडमरूमध्य 33 किलोमीटर का एक संकरा रास्ता है, लेकिन दुनिया का 20% तेल और 25% LNG यहीं से गुजरता है। युद्ध से पहले यहां प्रतिदिन 100 से ज्यादा जहाज गुजरते थे।

लेकिन अब तस्वीर बिल्कुल उलट है।

शिपिंग इंटेलिजेंस फर्म Kpler के डेटा के मुताबिक 1 मार्च से 23 मार्च तक सिर्फ 138 कमोडिटी जहाजों ने क्रॉसिंग की, जो शांति काल की तुलना में 95% कम है। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रैफिक 100 से गिरकर रोजाना सिर्फ 5 जहाजों पर आ गया है। शिपिंग जर्नल Lloyd’s List ने भी कहा है कि ट्रैफिक अभी भी बुरी तरह से बाधित है।

रॉयटर्स के मुताबिक पिछले हफ्ते स्थिति और खराब हुई, जब दो और जहाजों पर हमला हुआ और अमेरिका ने कहा कि वह ईरान की अनिश्चितकालीन नाकेबंदी जारी रख सकता है। मंगलवार को सिर्फ 6 कमोडिटी जहाजों ने जलडमरूमध्य पार किया, जो 10 दिन के औसत 11 से भी कम था।

क्यों गिरा ट्रैफिक?

  • ट्रंप प्रशासन ने ईरान से जुड़े जहाजों की अमेरिकी नाकेबंदी लगा दी है।
  • ईरान ने जवाब में अपनी “मॉस्किटो फ्लीट” गनबोट्स से जलडमरूमध्य को बंद करना शुरू कर दिया है।
  • जहाज मालिकों का कहना है कि सामान्य शिपमेंट में वापसी में महीनों लगेंगे।

इसका सीधा असर वैश्विक शिपिंग लागत और यूरोपीय ऊर्जा कीमतों पर पड़ा है। जहाजों को अब अफ्रीका के रास्ते 2 हफ्ते ज्यादा घूमना पड़ रहा है।

2. ट्रंप की “आर्थिक घेराबंदी” क्या है?

यह सिर्फ तेल नाकाबंदी नहीं है। राष्ट्रपति ट्रंप ने इसे Economic Siege (आर्थिक घेराबंदी) का नाम दिया है।

इसका मतलब है – ईरान को नहीं, बल्कि ईरान की मदद करने वालों को घेरो। ट्रंप ने उन देशों और कंपनियों पर भी कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं जो ईरान से तेल खरीदते हैं या उसे सामान बेचते हैं।

ट्रंप ने खुद कंजर्वेटिव रेडियो होस्ट ग्लेन बेक से कहा कि यह आर्थिक दबाव “एक बहुत बड़ी जीत की ओर जा रहा है”।

3. नेतन्याहू ने क्यों की सराहना? “तीसरा विकल्प” बताया

इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस घेराबंदी की जमकर तारीफ की है। 25 अगस्त को तेल अवीव के एत्जेल म्यूजियम में एक कार्यक्रम में नेतन्याहू ने कहा कि ईरान के “जंगली” शासकों से कोई राजनयिक समझौता संभव नहीं है।

नेतन्याहू ने खुलासा किया कि जुलाई में वॉशिंगटन में ट्रंप के साथ उनकी मीटिंग में तीन विकल्पों पर चर्चा हुई थी:

  1. कूटनीति (Diplomacy)
  2. सैन्य कार्रवाई (Force)
  3. घेराबंदी को और कसना (Tighter Siege)

नेतन्याहू ने कहा कि उन्होंने ट्रंप को तीसरा विकल्प – घेराबंदी को और कसने का सुझाव दिया था। उन्होंने कहा, “ट्रंप ने जो किया वह बहुत-बहुत-बहुत शक्तिशाली है। उन्होंने न सिर्फ ईरान पर, बल्कि उस भयानक तानाशाही की मदद करने वालों पर घेराबंदी कसी है। यह बहुत महत्वपूर्ण है”।

Times of Israel के मुताबिक नेतन्याहू ने कहा, “मुझे संदेह है कि वहां उस समूह के साथ, उन जंगलियों के साथ कोई समझौता हो सकता है”।

4. वैश्विक असर – यूरोप और भारत पर क्या पड़ेगा?

हॉर्मुज के बंद होने से सबसे ज्यादा मार यूरोप और एशिया पर पड़ रही है।

  • यूरोप: सर्दियों से पहले गैस की कीमतें 40% बढ़ गई हैं।
  • शिपिंग: कंटेनर का किराया 3 गुना हो गया है।
  • भारत: भारत अपना 60% कच्चा तेल हॉर्मुज से ही मंगाता है। अगर यह संकट लंबा चला तो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ सकते हैं।

अमेरिका का कहना है कि वह ईरान की नौसैनिक नाकाबंदी अनिश्चितकाल तक जारी रख सकता है। ईरान ने ओमान के शांति प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया है।

निष्कर्ष: क्या यह नई जंग की शुरुआत है?

यह सिर्फ व्यापार ठप होने की कहानी नहीं है। यह अमेरिका-इजरायल की एक नई रणनीति है – बिना बम गिराए ईरान को आर्थिक रूप से घुटनों पर लाना। ट्रंप और नेतन्याहू इसे “बिना युद्ध के जीत” बता रहे हैं, लेकिन ईरान इसे युद्ध की कार्रवाई मान रहा है।

अगर अगले कुछ हफ्तों में हॉर्मुज नहीं खुला, तो दुनिया को 1973 के तेल संकट जैसा एक और बड़ा ऊर्जा संकट झेलना पड़ सकता है।