Uttarakhand में Voluntary Chakbandi को लेकर ऐतिहासिक पहल, Gadul के ग्रामीणों ने दिखाई Unity
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डोईवाला/गडूल। डोईवाला विधानसभा क्षेत्र की भौगोलिक रूप से कठिन और दूरस्थ ग्राम पंचायत गडूल के बमेत गांव में रविवार, 30 अगस्त 2026 को हुई ग्रामीणों की बैठक ने पहाड़ की कृषि व्यवस्था को नई दिशा देने की उम्मीद जगाई है। गांव के ग्रामीणों ने पीढ़ियों से बिखरी कृषि भूमि को एकजुट करने के लिए स्वैच्छिक चकबंदी (Voluntary Land Consolidation) कराने का ऐतिहासिक निर्णय लिया।

सुबह से आयोजित बैठक में गांव के बुजुर्गों, किसानों, महिलाओं और युवाओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया। बैठक का मुख्य एजेंडा यही रहा कि पूर्वजों के समय से अलग-अलग टुकड़ों में बंटी कृषि भूमि को एक स्थान पर लाकर खेती को फिर से लाभदायक कैसे बनाया जाए।

ग्रामीणों का कहना है कि चकबंदी के अभाव में पहाड़ की खेती लगातार मुश्किल और घाटे का सौदा बनती जा रही है। एक ही परिवार की जमीन कई अलग-अलग स्थानों पर बंटी होने के कारण आधुनिक कृषि उपकरणों, ट्रैक्टर और सिंचाई सुविधाओं का प्रभावी इस्तेमाल नहीं हो पाता। खेती की लागत और मेहनत बढ़ने के कारण युवा पीढ़ी भी कृषि से दूर होकर शहरों की ओर पलायन कर रही है।

मुख्यमंत्री के आह्वान से मिली प्रेरणा

ग्रामीणों ने बताया कि उनका यह निर्णय उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के पर्वतीय क्षेत्रों में स्वैच्छिक चकबंदी को बढ़ावा देने के आह्वान से भी प्रेरित है। सरकार लगातार बंजर होती कृषि भूमि को आबाद करने और ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन रोकने के लिए भूमि चकबंदी को महत्वपूर्ण उपाय के रूप में आगे बढ़ा रही है।

राज्य सरकार ने 13 मई 2026 को हुई कैबिनेट बैठक में उत्तराखंड राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में स्वैच्छिक/आंशिक चकबंदी प्रोत्साहन नीति-2026 को मंजूरी दी है। नीति के तहत पर्वतीय क्षेत्रों में स्वैच्छिक आधार पर भूमि को एकीकृत करने की प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया जाना है।

275 गांवों को जोड़ने का लक्ष्य

सरकार की योजना अगले पांच वर्षों में पर्वतीय क्षेत्र के 11 जिलों के 275 गांवों को इस पहल से जोड़ने की है। योजना की खास बात यह है कि चकबंदी स्वैच्छिक आधार पर होगी और किसी ग्रामीण पर इसे थोपे जाने का प्रावधान नहीं है। इसके लिए गांव के 75 प्रतिशत ग्रामीणों की लिखित सहमति आवश्यक बताई गई है।

किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए स्वैच्छिक चकबंदी अपनाने वाले किसानों को स्वरोजगार योजनाओं के तहत लिए जाने वाले ऋण के ब्याज में 5 प्रतिशत तक की छूट देने का भी प्रावधान किया गया है।

बिखरी जमीन एक जगह आई तो बदल सकती है तस्वीर

बमेत गांव के ग्रामीणों का मानना है कि चकबंदी से कृषि क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण बदलाव संभव हैं। बिखरी हुई जोतें एक जगह आने से Modern Farming और कृषि मशीनरी का इस्तेमाल आसान होगा। लंबे समय से बंजर पड़ी जमीनों को समतल कर सामूहिक अथवा व्यावसायिक खेती के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि खेती को लाभदायक बनाया जा सके तो गांव के युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर मिल सकते हैं। इससे न केवल कृषि भूमि बचाने में मदद मिलेगी, बल्कि पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन को रोकने की दिशा में भी ठोस कदम उठाया जा सकता है।

अब प्रशासन से सर्वे शुरू करने की मांग

गडूल जैसे दूरस्थ क्षेत्र से ग्रामीणों का स्वयं आगे आकर स्वैच्छिक चकबंदी का निर्णय लेना इस बात का संकेत है कि पहाड़ का किसान अब अपनी कृषि भूमि और गांव के भविष्य को लेकर गंभीरता से सोच रहा है।

ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि राजस्व विभाग की टीम जल्द गांव में पहुंचकर आवश्यक सर्वे और अन्य प्रक्रिया शुरू करे, ताकि स्वैच्छिक चकबंदी की दिशा में आगे की कार्रवाई की जा सके।

बमेत का यह फैसला केवल एक गांव की जमीन को एकजुट करने की पहल नहीं, बल्कि पहाड़ की खेती, रोजगार और पलायन के सवाल से जुड़ा एक प्रयोग है। यदि यह मॉडल सफल होता है तो आने वाले समय में उत्तराखंड के अन्य पर्वतीय गांव भी इससे प्रेरणा ले सकते हैं।

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