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नैनीताल/हल्द्वानी। उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी शिफ्ट करने की कवायद को अब बड़ी कानूनी राहत मिली है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने हल्द्वानी के बेल बाबा क्षेत्र में प्रस्तावित हाईकोर्ट परिसर के खिलाफ दाखिल याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने याचिका को समय से पहले (premature) माना। हालांकि, कोर्ट के आदेश का यह अर्थ नहीं है कि हाईकोर्ट तत्काल हल्द्वानी स्थानांतरित हो रहा है, बल्कि शिफ्टिंग के लिए प्रस्तावित जमीन से जुड़ी वैधानिक प्रक्रिया पूरी किया जाना अभी बाकी है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस मनोज कुमार तिवारी और जस्टिस पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने 3 सितंबर 2026 के आदेश में कहा कि फिलहाल केवल वन भूमि का चयन किया गया है। जमीन को अभी विधिवत D-reserve नहीं किया गया है। राज्य सरकार की ओर से अदालत को आश्वासन दिया गया है कि भूमि हस्तांतरण और अन्य सभी प्रक्रियाएं संबंधित कानूनों और नियमों के अनुसार पूरी की जाएंगी।
याचिकाकर्ता ने प्रस्तावित भूमि को लेकर पर्यावरणीय और वन्यजीव संबंधी आपत्तियां उठाई थीं। उनका दावा था कि प्रस्तावित क्षेत्र हाथी कॉरिडोर में आता है। अदालत ने हालांकि मौजूदा स्थिति में इस आधार पर शिफ्टिंग प्रक्रिया को रोकने का आधार नहीं माना।
नैनीताल से शिफ्टिंग की जरूरत क्यों?
खंडपीठ ने अपने आदेश में नैनीताल की भौगोलिक और आधारभूत समस्याओं का भी उल्लेख किया। अदालत के अनुसार नैनीताल एक छोटा पर्वतीय पर्यटन स्थल है, जहां जमीन और बुनियादी ढांचे की उपलब्धता सीमित है। कनेक्टिविटी की समस्याएं और जीवनयापन की अधिक लागत भी चुनौती बनी हुई है।
इन परिस्थितियों का सबसे ज्यादा असर आर्थिक रूप से कमजोर वादकारियों, युवा अधिवक्ताओं और हाईकोर्ट के कर्मचारियों पर पड़ता है। साथ ही, नैनीताल में उपलब्ध सीमित बुनियादी ढांचे के कारण हाईकोर्ट में स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने में भी कठिनाइयां सामने आ रही हैं।
बेल बाबा क्षेत्र में प्रस्तावित है जमीन
हाईकोर्ट शिफ्टिंग की प्रक्रिया के तहत नैनीताल के जिलाधिकारी ने 14 मई 2026 को भूमि चिन्हित करने का आदेश जारी किया था। इसके बाद 19 जून को फुल कोर्ट की बैठक में हाईकोर्ट परिसर को हल्द्वानी क्षेत्र में स्थानांतरित करने के प्रस्ताव को आगे बढ़ाया गया।
प्रस्ताव के तहत तराई-सेंट्रल फॉरेस्ट डिवीजन, रुद्रपुर में बेल बाबा मंदिर के पास करीब 73 हेक्टेयर वन भूमि चिन्हित की गई है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले ही खुल चुका था रास्ता
हाईकोर्ट शिफ्टिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट भी 15 जुलाई 2026 को महत्वपूर्ण फैसला सुना चुका है। CJI की अध्यक्षता वाली पीठ ने हाईकोर्ट के 4 मई 2024 के उस आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया था, जिसमें हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी स्थानांतरित करने से पहले अधिवक्ताओं और पक्षकारों के बीच जनमत संग्रह कराने की बात कही गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि हाईकोर्ट अपने judicial side से ऐसे प्रशासनिक निर्णय नहीं दे सकता। अदालत का काम जनमत संग्रह कराना नहीं है। बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े ऐसे फैसले राज्य सरकार और हाईकोर्ट प्रशासन को मिलकर लेने होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को हल्द्वानी में चिन्हित जमीन से संबंधित आवश्यक मंजूरियां छह सप्ताह के भीतर पूरी कर जमीन हाईकोर्ट प्रशासन को सौंपने का निर्देश भी दिया था।
अब आगे क्या?
3 सितंबर के हाईकोर्ट आदेश के बाद शिफ्टिंग के खिलाफ मौजूदा कानूनी चुनौती फिलहाल समाप्त हो गई है। हालांकि, प्रस्तावित वन भूमि से जुड़ी वैधानिक, पर्यावरणीय और प्रशासनिक मंजूरियां पूरी होना अभी जरूरी है।
यानी सरल शब्दों में कहें तो नैनीताल से हल्द्वानी हाईकोर्ट शिफ्टिंग का कानूनी रास्ता काफी हद तक साफ हो चुका है, लेकिन अंतिम स्थानांतरण जमीन से जुड़ी सभी वैधानिक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद ही संभव होगा।

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