Spread the loveनैनीताल। उत्तराखंड में सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण व्यवस्था को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट में दाखिल जनहित याचिका पर सोमवार को सुनवाई हुई। अदालत ने मामले में राज्य सरकार का पक्ष जानने के लिए नोटिस जारी किया है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने सरकार को छह सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। यह जनहित याचिका हरिद्वार निवासी शेखर सैनी की ओर से दाखिल की गई है। याचिका में उत्तराखंड में लागू आरक्षण व्यवस्था की वैधानिकता को लेकर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि वर्ष 1994 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी सेवाओं में पिछड़े वर्गों को प्रतिनिधित्व देने के लिए कानून बनाया था। याचिका के अनुसार उस व्यवस्था में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए 21 प्रतिशत तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था। याचिका में दावा किया गया है कि उत्तराखंड राज्य बनने के बाद वर्ष 2001 में जारी शासनादेश के माध्यम से आरक्षण का प्रतिशत कम कर दिया गया। इसके तहत SC/ST के लिए 11 प्रतिशत और OBC के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण निर्धारित किए जाने का उल्लेख याचिका में किया गया है। याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष यह मुद्दा उठाया है कि यदि मूल अधिनियम में बदलाव आवश्यक था तो उसके लिए विधायी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी। याचिका में राज्य सरकार से आरक्षण व्यवस्था को लेकर स्पष्ट कानूनी प्रावधान बनाने की मांग भी की गई है। फिलहाल हाईकोर्ट ने इन दावों पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। अदालत ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है। सरकार का पक्ष सामने आने के बाद ही मामले में आगे की स्थिति स्पष्ट होगी। मामले की अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद होगी। रिपोर्ट: अजय सेमल्टी / HIMALAVANI Post Views: 135 Post navigation देहरादून में आउटसोर्स कर्मचारियों का सचिवालय कूच, नियमितीकरण और समान वेतन की उठी मांग उत्तराखंड में MBBS दाखिलों की जांच तेज, SIT ने मेडिकल कॉलेजों से मांगे दस्तावेज