11 साल पुराने केस में उत्तराखंड पुलिस को बड़ा झटका, ट्रैफिक सिपाही की हत्या की कोशिश के आरोप में तीनों आरोपी बरी
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देहरादून। उत्तराखंड में ट्रैफिक पुलिस के एक कांस्टेबल की हत्या के प्रयास से जुड़े 11 साल पुराने मामले में अदालत ने तीनों आरोपियों को बरी कर दिया है। पंचम अपर सत्र न्यायाधीश अंजलि बेंजवाल की अदालत ने पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। इस फैसले के बाद पुलिस की जांच और विवेचना की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

यह मामला 7 अगस्त 2015 की रात का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, देहरादून के यूकेलिप्टस चौक पर ट्रैफिक ड्यूटी में तैनात कांस्टेबल धर्मेंद्र कुमार ने तेज रफ्तार कार को रोकने का प्रयास किया था। आरोप था कि कार सवार दीपक शर्मा निवासी नई दिल्ली, अजय शर्मा और आकाश थापा निवासी देहरादून ने पहले कांस्टेबल पर गाड़ी चढ़ाने की कोशिश की। इसके बाद उनके साथ मारपीट की गई और वर्दी फाड़कर टी-शर्ट से गला दबाने का प्रयास किया गया।

घटना के बाद डालनवाला थाने में हत्या के प्रयास और सरकारी काम में बाधा डालने सहित विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था। पुलिस ने तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा था। हालांकि, बाद में उन्हें जमानत मिल गई थी और मामला अदालत में विचाराधीन रहा।

मेडिकल रिपोर्ट ने खोली अभियोजन की कमजोरियां

सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की कहानी को मेडिकल साक्ष्यों से समर्थन नहीं मिला। कांस्टेबल ने गला दबाने और खून निकलने का आरोप लगाया था, लेकिन डॉक्टर की गवाही में गर्दन पर रगड़ या सूजन के निशान मिलने की पुष्टि नहीं हुई। कथित फटी वर्दी और टी-शर्ट पर भी खून के निशान नहीं मिले।

CCTV फुटेज और स्वतंत्र गवाह भी नहीं जुटा सकी पुलिस

अदालत में जांच की कई कमियां सामने आईं। घटनास्थल व्यस्त और महत्वपूर्ण मार्ग पर होने के बावजूद पुलिस ने वहां लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज जांच में शामिल नहीं की। घटना के दौरान मौके पर भीड़ जुटने का दावा किया गया था, लेकिन किसी स्वतंत्र नागरिक को गवाह नहीं बनाया गया।

पुलिस की ओर से पेश गवाहों ने भी अदालत में अपने सामने मारपीट होने की पुष्टि नहीं की। इसके अलावा घटना वाली रात जनरल डायरी (GD) में चोट और वर्दी फटने से संबंधित तत्काल प्रविष्टि नहीं मिली। कथित फटी वर्दी को भी अगले दिन कब्जे में लिया गया।

11 साल बाद तीनों आरोपियों को राहत

अदालत ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों और गवाहियों का परीक्षण करने के बाद पाया कि आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं किया जा सका। इसी आधार पर तीनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।

करीब 11 वर्षों तक चले इस मुकदमे का फैसला पुलिस विवेचना की गुणवत्ता और आपराधिक मामलों में ठोस साक्ष्य जुटाने की जरूरत को फिर सामने लाता है। अदालत के फैसले से आरोपियों को राहत मिली है, जबकि पुलिस की जांच में सामने आई कमियां चर्चा का विषय बन गई हैं।

रिपोर्ट: HIMALAYAVANI | देहरादून

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