12 साल बाद माँ नंदा की बड़ी जात यात्रा शुरू
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 चमोली। उत्तराखंड की अधिष्ठात्री देवी माँ नंदा देवी की ऐतिहासिक बड़ी जात यात्रा आज 5 सितंबर 2026 से आधिकारिक रूप से शुरू हो गई है। 12 साल बाद आयोजित हो रही इस यात्रा को हिमालय का महाकुंभ कहा जाता है।

कुरूड़ सिद्धपीठ से हुआ शुभारंभ

परम्परा के अनुसार वसंत पंचमी को कुरूड़ मंदिर में पूजा के बाद गौड़ ब्राह्मणों द्वारा दिनपट्टा तय किया गया था। माँ नंदा ने अपने मुख्य अवतारी पुरुष पर अवतरित होकर इसी वर्ष कैलाश जाने की इच्छा जताई थी, जिसके बाद यात्रा की तिथि घोषित की गई।

आयोजन समिति के संयोजक कर्नल (सेनि) हरेंद्र सिंह रावत ने बताया कि यह यात्रा चमोली जिले के नंदानगर स्थित कुरूड़ से शुरू होकर कैलाश हिमालय तक जाएगी। लगभग 280 किलोमीटर लंबी यह यात्रा दुनिया की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्राओं में से एक मानी जाती है।

इस बार यात्रा को राजजात की जगह बड़ी जात नाम दिया गया है और पहली बार इसकी शुरुआत कुरूड़ से होकर होमकुंड तक जाएगी।

21 दिन का यात्रा कार्यक्रम घोषित, तीन डोलियां रवाना

बड़ी जात यात्रा समिति ने 21 दिन का यात्रा कार्यक्रम घोषित कर दिया है। 5 सितंबर को कुरूड़ मंदिर से दशोली, बधाण और बंड क्षेत्र की माँ नंदा की तीन डोलियां कैलाश के लिए प्रस्थान करेंगी।

आयोजन समिति के मुताबिक कुल 26 पड़ाव निर्धारित किए गए हैं।

मुख्य डोली माँ नंदा देवी राजराजेश्वरी का रूट:

  • 5 सितंबर: कुरूड़ से प्रस्थान, प्रथम रात्रि विश्राम चरबंग गांव में
  • 12 सितंबर: नंदकेशरी पहुंचेगी, यहां गढ़वाल और कुमाऊं की राज छंतोलियों का मिलन होगा।
  • 13-15 सितंबर: देवाल, मुंदोली, लोहाजंग, वाण गांव। 16 सितंबर को डोली अपने धर्म भाई के गांव वाण पहुंचेगी
  • 20 सितंबर: शिला समुद्र और पंचगंगा होते हुए होमकुंड पहुंचेगी। यहां पूजा-अर्चना, हवन व प्रसाद वितरण होगा। होमकुंड लगभग 17,500 फीट की ऊंचाई पर त्रिशूल पर्वत की तलहटी में स्थित है, जहां हवन के साथ यात्रा का समापन होगा।
  • 26 सितंबर: वापसी में डोली भेटा गांव पहुंचेगी, जहां माता की डोली छह माह तक स्थापित रहेगी।

दशोली और बंड की डोलियां:

  • दशोली की डोली पहले दिन कुमजुग, फिर 12 को रामणी गांव पहुंचेगी जहां बंड, दशमद्वार और लाता की डोली, जाख देवता की छतोली व बदरीनाथ की छतोली का मिलन होगा।
  • बंड की डोली मैठाणा, बिरही होते हुए 12 को रामणी पहुंचेगी और 20 को होमकुंड में पूजा के बाद 23 सितंबर को कुरूड़ मंदिर में विराजमान हो जाएगी।

यात्रा का धार्मिक महत्व

माँ नंदा देवी को गढ़वाल और कुमाऊं दोनों मंडलों की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।यह यात्रा माँ को उनके मायके से ससुराल कैलाश विदा करने का प्रतीक है। यात्रा के दौरान नैनीताल, अल्मोड़ा, कांसुवा और धारचूला सहित कई क्षेत्रों से देवी की छंतोलियां मुख्य यात्रा में शामिल होंगी और अंतिम कठिन चरण वाण गांव से लाटू देवता की अगुवाई में शुरू होगा।

वेदनी बुग्याल में पितृ तर्पण की विशेष परंपरा निभाई जाएगी।यात्रा का मार्गदर्शन चौसिंगा खाडू (चार सींग वाला भेड़) करेगा, जिसे माँ का वाहन माना जाता है।

प्रशासन और आयोजन समिति ने श्रद्धालुओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य और मूलभूत सुविधाओं के लिए विशेष प्रबंध शुरू कर दिए हैं।

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