Spread the love चमोली | उत्तराखंड के चमोली जिले में पीपलकोटी क्षेत्र में विष्णुगाड-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना की निर्माणाधीन टनल में हुए दर्दनाक हादसे ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है। टनल के भीतर अचानक भारी मात्रा में पानी, मलबा और कीचड़ घुसने से कई श्रमिक अंदर फंस गए। हादसे में अब तक 7 श्रमिकों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि 14 घायल श्रमिकों को बाहर निकालकर अस्पताल में भर्ती कराया गया है। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक कुछ श्रमिक अभी भी लापता हैं और उनकी तलाश के लिए राहत एवं बचाव अभियान जारी है। यह हादसा 13 अगस्त की शाम निर्माणाधीन टनल में हुआ। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार टनल के अंदर काम चल रहा था, तभी अचानक मलबे और पानी का तेज बहाव अंदर पहुंच गया। देखते ही देखते टनल का एक हिस्सा पानी और मलबे से भर गया और वहां काम कर रहे श्रमिकों के सामने जान बचाने की चुनौती खड़ी हो गई। अचानक टनल में घुसा पानी और मलबा प्रारंभिक जानकारी के अनुसार हादसा पीपलकोटी के मायापुर क्षेत्र में स्थित THDC की विष्णुगाड-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना की निर्माणाधीन टनल में हुआ। अधिकारियों के अनुसार टनल के अंदर काम कर रहे श्रमिकों को अचानक पानी और मलबे के तेज बहाव का सामना करना पड़ा। बताया गया है कि टनल के अंदर एक हिस्से में जमीन धंसने के बाद मलबा और पानी तेजी से अंदर आया। इसके कारण बड़ी संख्या में श्रमिक फंस गए। रिपोर्टों के मुताबिक टनल के प्रवेश द्वार से लगभग डेढ़ किलोमीटर अंदर यह घटना हुई। घटना के बाद वहां अफरा-तफरी मच गई। कुछ श्रमिकों ने किसी तरह बाहर निकलकर अपनी जान बचाई, जबकि कई श्रमिक पानी और मलबे के बीच फंस गए। 22 श्रमिकों के फंसे होने की सूचना हादसे के समय टनल के अंदर लगभग 22 श्रमिकों के मौजूद होने की जानकारी सामने आई थी। शुरुआती रेस्क्यू के दौरान अलग-अलग समय पर आंकड़ों में बदलाव भी हुआ, लेकिन अधिकारियों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार बड़ी संख्या में श्रमिकों को बाहर निकाल लिया गया। ताजा रिपोर्टों में 19 श्रमिकों को बाहर निकाले जाने और उनमें से सात की मौत की जानकारी दी गई है। तीन लोगों के लापता होने की सूचना के साथ उनकी तलाश जारी रहने की बात कही गई है। यही वजह है कि रेस्क्यू ऑपरेशन को अभी पूरी तरह समाप्त नहीं किया गया है। बचाव दल टनल के अंदर उन हिस्सों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं जहां पानी और मलबा जमा है। 7 श्रमिकों की मौत हादसे में अब तक 7 श्रमिकों की मौत की पुष्टि हुई है। यह संख्या शुरुआती घंटों में सामने आई संख्या से बढ़ी है, क्योंकि बचाव कार्य के दौरान घायलों और गंभीर रूप से फंसे श्रमिकों को बाहर निकालने का काम लगातार चलता रहा। मृतकों की पहचान और उनके गृह राज्यों को लेकर सामने आई जानकारी के अनुसार प्रभावित श्रमिक अलग-अलग राज्यों से आए थे। रिपोर्टों में उत्तराखंड के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों के श्रमिकों के शामिल होने की जानकारी दी गई है। इन मौतों की खबर के बाद श्रमिकों के परिवारों में मातम पसरा हुआ है। 14 श्रमिक घायल, अस्पताल में उपचार रेस्क्यू किए गए श्रमिकों में 14 घायल बताए गए हैं। घायलों को प्राथमिक उपचार के बाद जिला अस्पताल गोपेश्वर ले जाया गया, जहां उनका इलाज किया गया। रिपोर्टों के अनुसार कुछ श्रमिकों की हालत गंभीर भी बताई गई थी। आवश्यकता पड़ने पर बेहतर उपचार के लिए उन्हें उच्च चिकित्सा संस्थानों में भेजने की तैयारी भी रखी गई है। श्रीनगर बेस अस्पताल और एम्स ऋषिकेश को भी अलर्ट पर रखे जाने की जानकारी सामने आई है। घायलों के अस्पताल पहुंचने के बाद चिकित्सकों की टीम ने उनका उपचार शुरू किया। प्रशासन की ओर से घायलों के लिए आवश्यक चिकित्सा व्यवस्था सुनिश्चित करने की बात कही गई है। रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटीं कई एजेंसियां हादसे की सूचना मिलते ही राहत और बचाव एजेंसियों को सक्रिय किया गया। NDRF, SDRF, ITBP, सेना, पुलिस, जिला प्रशासन और अन्य आपदा राहत दलों को मौके पर लगाया गया। रेस्क्यू टीमों ने भारी मशीनों की मदद से मलबा हटाने का काम शुरू किया। टनल के भीतर जमा पानी को बाहर निकालने के लिए पंप भी लगाए गए। रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान सबसे बड़ी चुनौती टनल के अंदर लगातार जमा हो रहा पानी, कीचड़ और अस्थिर चट्टानों को बताया गया। ऐसी स्थिति में बचाव दलों के लिए आगे बढ़ना भी जोखिम भरा था। पानी निकालने के लिए लगाए गए पंप टनल में पानी का स्तर बढ़ने के कारण राहत और बचाव अभियान प्रभावित हुआ। प्रशासन और परियोजना से जुड़ी एजेंसियों ने पानी निकालने के लिए बड़े पंप लगाए। रेस्क्यू टीमों का उद्देश्य पहले टनल के अंदर जमा पानी का स्तर कम करना और उसके बाद मलबे को हटाकर उन स्थानों तक पहुंचना था जहां श्रमिकों के फंसे होने की संभावना थी। मलबे को हटाने के लिए भारी मशीनरी का इस्तेमाल किया गया। विशेषज्ञों और बचावकर्मियों की निगरानी में टनल के अंदर अभियान चलाया गया। मुख्यमंत्री धामी ने संभाली स्थिति की निगरानी हादसे की जानकारी मिलते ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र में अधिकारियों के साथ बैठक कर रेस्क्यू ऑपरेशन की समीक्षा की। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि राहत एवं बचाव कार्य में किसी भी तरह की लापरवाही न हो और टनल में फंसे प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षित निकालने के लिए उपलब्ध सभी संसाधनों का इस्तेमाल किया जाए। इसके बाद मुख्यमंत्री ने घटनास्थल का निरीक्षण भी किया और बचाव अभियान की स्थिति की जानकारी ली। उन्होंने गोपेश्वर जिला अस्पताल पहुंचकर घायल श्रमिकों से मुलाकात की और उनके स्वास्थ्य के बारे में चिकित्सकों से जानकारी ली। मृतकों के परिवारों के लिए आर्थिक सहायता मुख्यमंत्री की ओर से हादसे में जान गंवाने वाले श्रमिकों के परिवारों को आर्थिक सहायता देने की घोषणा की गई है। रिपोर्टों के अनुसार मृतकों के परिजनों को चार-चार लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने की बात कही गई है। सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि घायलों के इलाज में किसी तरह की कमी नहीं आने दी जाएगी। मजदूरों ने बताई हादसे की खौफनाक कहानी हादसे से बचकर बाहर निकले कुछ श्रमिकों ने उस समय की भयावह स्थिति के बारे में बताया है। एक श्रमिक के अनुसार घटनाक्रम इतनी तेजी से हुआ कि प्रतिक्रिया देने के लिए बेहद कम समय मिला। एक अन्य रिपोर्ट में श्रमिक ने बताया कि जमीन हिलने के बाद अचानक पानी और मलबा तेजी से टनल के अंदर आया। कुछ ही क्षणों में सामान्य काम का माहौल भयावह स्थिति में बदल गया। घायल श्रमिकों के अनुभव इस बात को सामने लाते हैं कि टनल के अंदर काम करने वाले मजदूरों के लिए हादसा कितना अचानक और खतरनाक था। पहले भी सुरक्षा संबंधी शिकायतों का दावा हादसे के बाद टनल में काम कर रहे कुछ श्रमिकों की ओर से यह दावा भी सामने आया कि टनल में पहले से मलबा गिरने और सुरक्षा संबंधी समस्याओं की शिकायतें की गई थीं। कुछ श्रमिकों ने आरोप लगाया कि टनल की छत और दीवारों से ढीला मलबा गिरने की घटनाएं पहले भी हुई थीं और सुरक्षा को लेकर चिंता जताई गई थी। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। यदि शिकायतें वास्तव में की गई थीं तो यह जांच का महत्वपूर्ण विषय होगा कि उन पर क्या कार्रवाई हुई और सुरक्षा मानकों को लेकर क्या कदम उठाए गए। क्या सुरक्षा मानकों में हुई चूक? हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर निर्माणाधीन टनल में इतनी बड़ी मात्रा में पानी और मलबा अचानक कैसे पहुंचा। उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। यहां पहाड़ों की चट्टानों की संरचना, बारिश, भू-स्खलन, भूमिगत जल और कमजोर भूगर्भीय क्षेत्र बड़े निर्माण कार्यों के लिए गंभीर चुनौती पैदा करते हैं। विष्णुगाड-पीपलकोटी परियोजना से संबंधित तकनीकी दस्तावेजों में भी क्षेत्र की जटिल भूगर्भीय परिस्थितियों और कुछ हिस्सों में कमजोर चट्टानों तथा पानी के रिसाव जैसी चुनौतियों का उल्लेख किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हादसे का कारण निश्चित रूप से सुरक्षा में चूक ही थी। अंतिम कारण जांच के बाद ही स्पष्ट होगा। मजिस्ट्रियल जांच के आदेश हादसे के कारणों का पता लगाने के लिए सरकार की ओर से जांच के निर्देश दिए गए हैं। रिपोर्टों के अनुसार मुख्यमंत्री ने घटना की मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए हैं। जांच में यह देखा जाना महत्वपूर्ण होगा कि टनल निर्माण के दौरान कौन-कौन से सुरक्षा मानक लागू थे, उनका पालन किस स्तर तक हुआ, जमीन और चट्टानों की निगरानी किस प्रकार की जा रही थी और पानी के अचानक प्रवेश से निपटने के लिए क्या व्यवस्था मौजूद थी। विष्णुगाड-पीपलकोटी परियोजना क्या है? पीपलकोटी क्षेत्र में स्थित विष्णुगाड-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना अलकनंदा नदी पर विकसित की जा रही जलविद्युत परियोजना है। यह परियोजना लगभग 444 मेगावाट क्षमता की है। परियोजना के तहत लंबी सुरंगों और अन्य बड़े निर्माण कार्यों का निर्माण किया जा रहा है। पर्वतीय क्षेत्र में इस तरह की परियोजनाओं के निर्माण में भूगर्भीय परिस्थितियों का विशेष महत्व होता है। सुरंग निर्माण के दौरान चट्टानों की मजबूती, पानी का दबाव, दरारें और जमीन की स्थिरता लगातार निगरानी का विषय रहती हैं। उत्तराखंड में टनल हादसों का दर्द चमोली का यह हादसा उत्तराखंड में टनल निर्माण से जुड़ी दुर्घटनाओं की पुरानी चिंताओं को फिर सामने ले आया है। 2023 में उत्तरकाशी की सिलक्यारा-बड़कोट सुरंग में 41 श्रमिक कई दिनों तक फंसे रहे थे और लंबे रेस्क्यू अभियान के बाद उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला गया था। उस घटना ने देशभर में टनल निर्माण की सुरक्षा को लेकर गंभीर चर्चा पैदा की थी। अब पीपलकोटी हादसे में श्रमिकों की मौत ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में बड़े निर्माण कार्यों के दौरान श्रमिक सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता किस तरह सुनिश्चित किया जाए। परिवारों पर टूटा दुखों का पहाड़ हादसे में जान गंवाने वाले श्रमिकों के परिवारों के लिए यह घटना जीवनभर का दुख बन गई है। इनमें कई ऐसे श्रमिक थे जो अपने परिवारों के भरण-पोषण के लिए उत्तराखंड में काम करने आए थे। दूसरे राज्यों से आए श्रमिकों के परिवारों को हादसे की सूचना के बाद अपने प्रियजनों की चिंता सताने लगी। प्रशासन के सामने मृतकों की पहचान, शवों को उनके गृह राज्यों तक पहुंचाने और परिवारों को आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने की चुनौती भी है। रेस्क्यू टीमों के सामने अभी भी बड़ी चुनौती लापता श्रमिकों की तलाश के दौरान बचाव दलों को बेहद सावधानी से आगे बढ़ना पड़ रहा है। टनल के अंदर पानी, कीचड़ और मलबा होने के साथ-साथ चट्टानों के अस्थिर होने का खतरा बना हुआ है। ऐसे में बचावकर्मियों की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है। रेस्क्यू टीमों द्वारा लगातार पानी निकालने, मलबा हटाने और संभावित स्थानों की जांच का काम किया जा रहा है। सरकार के सामने अब कई सवाल इस हादसे के बाद सरकार और परियोजना प्रबंधन के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल हैं— क्या टनल में पानी और मलबे के संभावित खतरे की पहले से पहचान थी? क्या श्रमिकों ने पहले सुरक्षा संबंधी शिकायतें की थीं? यदि शिकायतें हुई थीं तो उन पर क्या कार्रवाई की गई? क्या टनल में पर्याप्त आपातकालीन निकासी व्यवस्था थी? क्या पानी की निगरानी और निकासी की पर्याप्त व्यवस्था मौजूद थी? क्या निर्माण स्थल पर सुरक्षा मानकों का नियमित ऑडिट किया जाता था? इन सभी सवालों के जवाब जांच पूरी होने के बाद सामने आने चाहिए। फिलहाल प्राथमिकता—हर लापता श्रमिक को तलाशना हादसे की जांच अपनी जगह है, लेकिन फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता लापता श्रमिकों को तलाशना और उन्हें सुरक्षित बाहर निकालना है। NDRF, SDRF, ITBP, सेना, पुलिस, प्रशासन और अन्य एजेंसियां लगातार अभियान में जुटी हैं। बचाव दलों के लिए प्रत्येक मिनट महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर घायलों का इलाज जारी है और मृत श्रमिकों के परिवारों को सहायता उपलब्ध कराने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई जा रही है। करारा सवाल: पहाड़ों में विकास जरूरी, लेकिन मजदूरों की सुरक्षा से समझौता क्यों? उत्तराखंड को ऊर्जा, सड़क, सुरंग और अन्य आधारभूत ढांचे की जरूरत है। विकास परियोजनाएं राज्य की अर्थव्यवस्था और कनेक्टिविटी के लिए महत्वपूर्ण हैं। लेकिन हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए विकास की हर परियोजना में मानव जीवन और सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। पीपलकोटी का हादसा केवल सात श्रमिकों की मौत की घटना नहीं है, बल्कि यह सवाल भी है कि भविष्य में ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे। यदि जांच में सुरक्षा संबंधी किसी प्रकार की लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय होना जरूरी है। वहीं यदि प्राकृतिक और भूगर्भीय कारण हादसे के लिए जिम्मेदार पाए जाते हैं तो भविष्य की परियोजनाओं में ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए और मजबूत सुरक्षा प्रोटोकॉल तैयार करने होंगे। फिलहाल पूरा ध्यान रेस्क्यू ऑपरेशन पर है। लापता श्रमिकों की तलाश जारी है और उम्मीद है कि बचाव दल जल्द से जल्द उन्हें सुरक्षित बाहर निकालने में सफल होंगे। नोट: हादसे में मृतकों, घायलों और लापता श्रमिकों की संख्या रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान बदलती रही है। इसलिए प्रकाशन के समय प्रशासन/जिला प्रशासन के नवीनतम आधिकारिक आंकड़े को अंतिम आंकड़ा माना जाना चाहिए। — हिमालय वाणी, चमोली डेस्क Post Views: 2 Post navigation उत्तराखंड में धूमधाम से मना 80वां स्वतंत्रता दिवस: परेड ग्राउंड में CM धामी ने फहराया तिरंगा, Gen-Z और युवाओं के भविष्य पर रहा खास फोकस उत्तराखंड में बारिश का कहर: ऑरेंज और येलो अलर्ट के बीच पहाड़ों में भूस्खलन, कई सड़कें बंद