Spread the loveदेहरादून। नेपाल के सुदूर पश्चिमी इलाके में ग्लेशियर झील फटने (Glacial Lake Outburst Flood – GLOF) से शारदा नदी में आई अचानक बाढ़ ने उत्तराखंड सरकार की चिंता बढ़ा दी है। तनकपुर बैराज और सीमांत इलाकों में जलस्तर खतरे के निशान के करीब पहुंचने के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बुधवार देर शाम सचिवालय में आपदा प्रबंधन की हाई-लेवल इमरजेंसी बैठक बुलाई और ग्लेशियर झीलों की सुरक्षा को लेकर अब तक के सबसे कड़े निर्देश जारी किए।नेपाल की घटना से उत्तराखंड में क्यों मचा हड़कंप?दरअसल, 26 अगस्त की रात नेपाल के हुमला जिले में 4,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक अनाम ग्लेशियर झील का एक हिस्सा टूट गया। इससे अचानक लाखों क्यूबिक मीटर पानी, मलबा और बर्फ महाकाली-शारदा नदी में आ गया। इसका सीधा असर उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के धारचूला, टनकपुर और चंपावत के निचले इलाकों में देखा गया। शारदा नदी का जलस्तर 6 घंटे में 4 मीटर बढ़ गया, जिससे तनकपुर में एसडीआरएफ को अलर्ट पर रखा गया और नदी किनारे बसे लोगों को सुरक्षित जगहों पर शिफ्ट किया गया।इसी घटना को 2013 की केदारनाथ त्रासदी और 2021 की चमोली त्रासदी की चेतावनी मानते हुए सीएम ने कहा कि अब इंतजार नहीं, बल्कि तैयारी करनी होगी।सीएम धामी के 5 बड़े और डिटेल्ड निर्देश1. 13 हाई-रिस्क ग्लेशियर झीलों की पहचान – बनेगा लाइव डैशबोर्ड:राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) के मुताबिक, उत्तराखंड में 1,266 ग्लेशियर झीलें हैं, जिनमें से 13 को हाई-रिस्क और 34 को मीडियम-रिस्क कैटेगरी में रखा गया है। सबसे ज्यादा खतरनाक झीलें चमोली की वसुधारा ताल, उत्तरकाशी की केदार ताल और पिथौरागढ़ की पार्वती ताल हैं। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया है कि इन सभी 13 झीलों की सैटेलाइट, ड्रोन और ग्राउंड सेंसर से 24×7 लाइव मॉनिटरिंग के लिए इसरो, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान और GSI के साथ मिलकर एक सेंट्रलाइज्ड डैशबोर्ड बनाया जाए। हर झील के पानी के तापमान, आयतन और बर्फ पिघलने की दर की रिपोर्ट हर हफ्ते मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजी जाएगी।2. एडवांस्ड अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS) – अब 30 मिनट पहले मिलेगा अलर्ट:अब तक राज्य में सिर्फ नदियों के जलस्तर को नापने वाले गेज लगे थे। अब सीधे ग्लेशियर झीलों पर ऑटोमेटिक वाटर लेवल सेंसर, जियोफोन और सायरन सिस्टम लगाए जाएंगे।कैसे काम करेगा सिस्टम? – अगर झील का जलस्तर 10 सेंटीमीटर प्रति घंटे से ज्यादा तेजी से बढ़ेगा, तो सेंसर तुरंत देहरादून स्थित राज्य आपदा नियंत्रण कक्ष, जिला कलेक्ट्रेट और निचले गांवों में लगे सायरन को एक्टिवेट कर देगा। साथ ही गांव के प्रधान, पटवारी और एसडीआरएफ की टीम को ऑटोमेटिक SMS और सैटेलाइट फोन कॉल चला जाएगा। इससे बाढ़ आने से 30 से 90 मिनट पहले ही गांव खाली कराए जा सकेंगे।3. पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत पिथौरागढ़-चमोली से:सचिव आपदा प्रबंधन विनोद कुमार सुमन ने बताया कि अगले 15 दिन में पिथौरागढ़ की पार्वती झील और चमोली की वसुंधरा झील पर पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर EWS लगा दिया जाएगा। अक्टूबर 2026 तक सभी 13 हाई-रिस्क झीलों को इस सिस्टम से कवर करने का लक्ष्य है। इसके लिए करीब 18 करोड़ रुपये की पहली किस्त जारी कर दी गई है।4. शारदा-धौलीगंगा-काली नदी पर विशेष चौकसी:नेपाल सीमा से सटी नदियों पर हर 1 घंटे में जलस्तर की रिपोर्टिंग अनिवार्य कर दी गई है। तनकपुर बैराज, धारचूला और जोशीमठ में NDRF और SDRF की दो-दो अतिरिक्त कंपनियां तैनात की गई हैं। नदी किनारे बसे 42 गांवों में मुनादी कराकर लोगों को नदी से दूर रहने को कहा गया है।5. ग्रामीणों की ट्रेनिंग – आपदा मित्र योजना:सिर्फ मशीन नहीं, लोगों को भी तैयार किया जाएगा। हर संवेदनशील गांव में 10 युवाओं को ‘ग्लेशियर आपदा मित्र’ के रूप में ट्रेनिंग दी जाएगी, जो सायरन बजने पर लोगों को सुरक्षित निकालने और रेस्क्यू में मदद करेंगे।विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?वाडिया संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. मनीष मेहता के अनुसार, “पिछले 10 साल में उत्तराखंड का औसत तापमान 0.8 डिग्री बढ़ा है, जिससे ग्लेशियर झीलों का आकार 25% तक बढ़ गया है। GLOF अब ‘कभी-कभी होने वाली घटना’ नहीं, बल्कि हर मानसून की हकीकत है। अर्ली वार्निंग सिस्टम ही जान बचा सकता है।”फिलहाल सरकार ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों के आसपास किसी भी तरह के निर्माण या ट्रेकिंग गतिविधि पर तत्काल रोक लगाएं। Post Views: 6 Post navigationरुद्रपुर जिला अस्पताल में डॉक्टरों की कमी पर CM को ज्ञापन देने जा रहे पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल हिरासत में, बाद में रिहा RTI में बड़ा खुलासा: कृषि विभाग में ₹11.52 करोड़ अपात्रों को बांटे, ₹14.44 करोड़ का भुगतान बिना Unique ID के