Spread the loveडोईवाला, देहरादून। विकास की भेंट चढ़ी पुरानी टिहरी की यादें अब टिहरी झील के पानी में नहीं, बल्कि डोईवाला के कोटि अठूरवाला की जमीन पर जिंदा रहेंगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने विधानसभा क्षेत्र डोईवाला के अठूरवाला टिहरी विस्थापित क्षेत्र में ऐतिहासिक घंटाघर के निर्माण के लिए 97 लाख रुपये की वित्तीय स्वीकृति प्रदान की है। यह स्वीकृति 86 करोड़ की विभिन्न विकास योजनाओं के पैकेज का हिस्सा है।यह परियोजना सिर्फ एक निर्माण नहीं, बल्कि एक पूरी सभ्यता को फिर से खड़ा करने का सराहनीय प्रयास है।क्या है घंटाघर का 128 साल पुराना इतिहास?पुरानी टिहरी का असली घंटाघर उत्तराखंड की शान था। इसका निर्माण टिहरी रियासत के तत्कालीन महाराजा कीर्ति शाह ने 1897 में करवाया था। लंदन में बने एक घंटाघर के डिजाइन पर बने 110 फीट ऊंचे इस घंटाघर को बनने में 3 साल लगे थे। इतिहासकार बताते हैं कि इसे उड़द की दाल के लेप से बनाया गया था, यही वजह है कि टिहरी बांध की झील में पूरी तरह डूबने के बाद भी यह आज तक सुरक्षित खड़ा है। जब झील का जलस्तर कम होता है तो यह घंटाघर पानी के ऊपर शान से दिखाई देता है और हजारों लोग अपनी पुरानी यादों को ताजा करने वहां पहुंचते हैं।जब टिहरी बांध बना तो राजा का महल, बाजार, मंदिर और यह घंटाघर सब जलसमाधि में चले गए थे। अब उसी की भव्य प्रतिकृति अठूरवाला में बनाई जाएगी।घंटाघर के साथ बनेगा अत्याधुनिक म्यूजियमइस परियोजना में सिर्फ घंटाघर की प्रतिकृति ही नहीं, बल्कि एक मॉडर्न म्यूजियम का निर्माण भी शामिल है। इस म्यूजियम को उत्तराखंड की धरोहर को संजोने के लिए डिजाइन किया जाएगा।म्यूजियम में पुरानी टिहरी के इतिहास से जुड़ी दुर्लभ तस्वीरें, राजशाही दौर के दस्तावेज, टिहरी डूब क्षेत्र से लाए गए बर्तन, औजार और जनजीवन से जुड़ी सामग्रियां प्रदर्शित की जाएंगी। इसका मुख्य उद्देश्य आज की युवा पीढ़ी को उस गौरवशाली विरासत से रूबरू कराना है जो कभी टिहरी के नाम से जानी जाती थी। नई टिहरी में पहले ही घंटाघर, पुराना दरबार, रानीबाग जैसे नामों से मोहल्लों के नाम रखने की पहल हो चुकी है, अब अठूरवाला में यह जीवंत स्मारक बनेगा।विस्थापितों के लिए भावुक क्षण और पर्यटन को बढ़ावाअठूरवाला में बड़ी संख्या में टिहरी बांध से विस्थापित परिवार रहते हैं। हर साल 31 जुलाई को वे “एक थी टिहरी” स्मृति स्थल पर दीपांजलि अर्पित करते हैं। उनके लिए यह घंटाघर सिर्फ एक टावर नहीं, बल्कि अपनी मातृभूमि से फिर से जुड़ने का एहसास होगा।प्रशासनिक स्तर पर जमीनी और कागजी तैयारियां तेजी से चल रही हैं। डोईवाला क्षेत्र पहले से ही लच्छीवाला नेचर पार्क और जौलीग्रांट एयरपोर्ट के कारण पर्यटन मानचित्र पर है। अब घंटाघर और म्यूजियम के बनने से कोटि अठूरवाला एक प्रमुख सांस्कृतिक पर्यटन केंद्र के रूप में उभरेगा। इससे स्थानीय स्तर पर गाइड, होमस्टे, परिवहन और छोटे व्यापार के रूप में रोजगार को भी बढ़ावा मिलेगा।यह परियोजना साबित करती है कि विकास के साथ-साथ विरासत को भी सहेजा जा सकता है। Post Views: 3 Post navigationडोईवाला में भू-माफियाओं पर गरजा पालिका का पीला पंजा, सुसवा नदी की 15 बीघा सरकारी जमीन कब्जामुक्त