Spread the loveदेहरादून |उत्तराखंड में Special Intensive Revision (SIR) को लेकर सियासी विवाद तेज हो गया है। कांग्रेस ने मतदाता सूची में कथित तौर पर दिल्ली और बरेली के लोगों के नाम शामिल होने का मुद्दा उठाते हुए धामी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। कांग्रेस का कहना है कि SIR की प्रक्रिया की आड़ में मतदाताओं के नाम हटाने की राजनीति की जा रही है।कांग्रेस के प्रदेश सचिव अमेंद्र बिष्ट ने दावा किया कि मतदाता सूची में आपत्ति के लिए दर्ज कुछ नामों और फोन नंबरों की जांच के दौरान ऐसे लोगों से संपर्क हुआ, जिन्होंने उत्तराखंड से किसी तरह का संबंध होने या आपत्ति दर्ज कराने से इनकार किया। इस मामले से जुड़ा एक वीडियो भी सामने आया है, हालांकि संबंधित मीडिया रिपोर्ट ने वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की है।कांग्रेस ने उठाए SIR की प्रक्रिया पर सवालकांग्रेस का आरोप है कि यदि मतदाता सूची में ऐसे लोगों के नाम या मोबाइल नंबर दर्ज किए जा रहे हैं जिनका उत्तराखंड से संबंध नहीं है, तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। पार्टी ने निर्वाचन प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और वास्तविक मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखने की मांग की है।कांग्रेस का कहना है कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम केवल राजनीतिक या प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण मतदाता सूची से नहीं हटना चाहिए।निर्वाचन आयोग की प्रतिक्रिया भी सामने आईमामले में निर्वाचन आयोग की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आने की बात रिपोर्ट में कही गई है। ऐसे में पूरे विवाद में आरोपों और आधिकारिक जांच के निष्कर्षों के बीच अंतर करना जरूरी है। फिलहाल सामने आए आरोपों को अंतिम तथ्य मानने के बजाय संबंधित निर्वाचन अधिकारियों की जांच और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।जमीन आवंटन से भी जोड़ा जा रहा मामलाSIR विवाद के साथ ही उत्तराखंड में भूमि आवंटन और बाहरी लोगों के नाम को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज हो रही है। विपक्ष इस मुद्दे को राज्य में मूल निवासियों के अधिकार, जमीन और मतदाता पहचान से जोड़कर सरकार पर सवाल उठा रहा है।हालांकि जमीन आवंटन और मतदाता सूची से जुड़े अलग-अलग आरोपों के बीच वास्तविक संबंध क्या है, यह आधिकारिक दस्तावेजों और जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।अब सवाल—कितने नाम संदिग्ध और कितने वास्तविक?SIR जैसी प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक और अद्यतन बनाना है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी व्यक्ति का नाम गलत तरीके से दर्ज है तो उसकी जांच किस स्तर पर हुई और यदि किसी पात्र मतदाता का नाम हटाया जा रहा है तो उसे पर्याप्त अवसर और सूचना मिल रही है या नहीं।राजनीतिक आरोपों के बीच अब निगाहें निर्वाचन आयोग और संबंधित अधिकारियों की जांच पर टिकी हैं। यदि अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, लेकिन बिना सत्यापन किसी व्यक्ति को फर्जी मतदाता घोषित करना भी उचित नहीं होगा। Post Views: 6 Post navigationस्वारना नदी में फंसे UPES के 6 छात्रों को SDRF ने किया सुरक्षित रेस्क्यू, 6 KM पैदल चलकर पहुंची टीम उत्तराखंड में आसमानी आफत का अलर्ट: छह जिलों में भारी से बहुत भारी बारिश का खतरा, गंगा और नदियों के बढ़ते जलस्तर ने बढ़ाई चिंता