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नई दिल्ली। धर्मांतरण के बाद आरक्षण का लाभ पाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को लेकर चर्चा तेज हो गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने इस मामले में मद्रास हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप नहीं किया। हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को निरस्त कर दिया था, जिसमें कुछ समुदायों के लोगों को इस्लाम अपनाने के बाद पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में शामिल करने का प्रावधान था।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मामले में धर्म परिवर्तन और सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण के लाभ का सवाल उठा। अदालत के फैसले का आधार यह है कि धर्म परिवर्तन से पहले की सामाजिक स्थिति के आधार पर किसी व्यक्ति को दूसरे धार्मिक समुदाय में पिछड़ा वर्ग का दर्जा स्वतः नहीं मिल जाता। इसके लिए संबंधित श्रेणी के संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों को देखना आवश्यक है।

अनुसूचित जाति के दर्जे पर क्या है प्रावधान?

संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 के तहत अनुसूचित जाति का दर्जा सामान्यतः हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म मानने वाले पात्र व्यक्तियों तक सीमित है। इस प्रावधान के अनुसार, इन धर्मों के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त नहीं कर सकता।

हालांकि, अनुसूचित जाति के दर्जे और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण को एक ही नियम के तहत नहीं देखा जा सकता। दोनों की पात्रता अलग-अलग संवैधानिक प्रावधानों, सूचियों और लागू नियमों से निर्धारित होती है।

संविधान के अनुच्छेद 16(4) का संदर्भ

संविधान का अनुच्छेद 16(4) राज्य को उन पिछड़े वर्गों के पक्ष में नियुक्तियों और पदों में आरक्षण की व्यवस्था करने की अनुमति देता है, जिनका राज्य की सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। किसी व्यक्ति को इस प्रावधान के तहत लाभ मिलेगा या नहीं, यह संबंधित वर्ग की पात्रता और लागू नियमों पर निर्भर करता है।

फैसले का क्या है महत्व?

इस मामले में मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखे जाने से तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को राहत नहीं मिली, जिसे हाईकोर्ट ने निरस्त किया था। यह मामला धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण की पात्रता और विभिन्न सामाजिक श्रेणियों के बीच कानूनी अंतर को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि धर्म परिवर्तन के बाद सभी प्रकार के आरक्षण स्वतः समाप्त होने का निष्कर्ष हर मामले पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता। अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की पात्रता अलग-अलग नियमों के अधीन है। किसी व्यक्ति की वास्तविक पात्रता संबंधित कानून, सरकारी सूची और अदालत के फैसले के सटीक दायरे के आधार पर तय होगी।

रिपोर्ट: अजय सेमल्टी / HIMALAVANI