मरीज को सीधा फायदा: सरकारी अस्पताल में 90% दवाएं फ्री मिलना सुनिश्चित। बाहर से महंगी दवा खरीदने की मजबूरी खत्म। नकली और घटिया दवा पर रोक, क्योंकि क्वालिटी टेस्ट सेंट्रल लैब में होगा।
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देहरादून। धामी कैबिनेट 2026 की बैठक को अगर सिर्फ नौकरियों तक सीमित देखेंगे तो बड़ी तस्वीर छूट जाएगी। सरकार ने दो ऐसे स्ट्रक्चरल रिफॉर्म को मंजूरी दी है जो अगले 10 साल तक गांव-गांव और अस्पताल-अस्पताल में असर दिखाएंगे।

1. उत्तराखंड राज्य सहकारिता नीति-2026 – कागज से कंप्यूटर तक का सफर
पुरानी व्यवस्था में क्या दिक्कत थी?
उत्तराखंड में 670 से ज्यादा PACS और 2000 से ज्यादा सहकारी समितियां हैं। इनमें 90% का रिकॉर्ड आज भी रजिस्टर में है। किसान का लोन पास होने में 2 महीने, खाद का हिसाब मैनुअल, और ऑडिट में साल भर का गैप। कई जगह अध्यक्ष-सचिव ही समिति को अपनी जागीर समझते थे।

नई नीति 2026 में क्या बदलेगा? – 7 बड़े पिलर

A. डिजिटल PACS मिशन: केंद्र सरकार की तर्ज पर हर PACS को ERP सॉफ्टवेयर से जोड़ा जाएगा। किसान का खाता, जमीन का रिकॉर्ड, लोन की स्थिति – सब मोबाइल पर दिखेगा।

B. पारदर्शिता मॉडल: हर समिति की बैलेंस शीट, लाभ-हानि, ऑडिट रिपोर्ट अब ऑनलाइन पब्लिक डोमेन में होगी। सदस्य घर बैठे देख सकेगा कि समिति में कितना पैसा आया।

C. बहुउद्देशीय समिति: अब PACS केवल लोन नहीं देगी, बल्कि 5 नए काम करेगी:

1. जन औषधि केंद्र के रूप में सस्ती दवा
2. CSC सेंटर के रूप में सरकारी फॉर्म
3. FPO के रूप में किसानों की फसल की बिक्री
4. दूध समिति और मत्स्य पालन
5. सस्ते राशन और LPG वितरण
D. युवाओं के लिए: हर समिति में एक युवा प्रोफेशनल मैनेजर रखने का प्रावधान, ताकि पुरानी राजनीति खत्म हो।

असर: 10 लाख से ज्यादा किसान, 2 लाख दुग्ध उत्पादक और 5 लाख महिला स्वयं सहायता समूह की महिलाएं सीधे लाभान्वित होंगी।

2. उत्तराखंड मेडिकल सप्लाइज कॉरपोरेशन लिमिटेड – अब दवा के लिए नहीं भटकेगा मरीज
जमीनी सच्चाई क्या थी?
पिछले साल दून मेडिकल कॉलेज में स्टेंट नहीं था, हल्द्वानी में कैंसर की दवा 3 महीने लेट आई। कारण – हर जिले का CMO अलग-अलग टेंडर करता था। कंपनी सप्लाई में देरी करती थी, तो मरीज को 10,000 की दवा बाहर से 30,000 में खरीदनी पड़ती थी। CAG ने भी 2024 में इस पर सवाल उठाया था।

कॉरपोरेशन का पूरा मॉडल:

संरचना: यह एक सरकारी कंपनी होगी। अध्यक्ष – मुख्य सचिव, MD – IAS अधिकारी, और बोर्ड में स्वास्थ्य सचिव, वित्त सचिव और 2 एक्सपर्ट डॉक्टर।

काम कैसे करेगा?

  • सेंट्रलाइज्ड खरीद: पूरे प्रदेश के 500 से ज्यादा अस्पतालों की साल भर की दवा की जरूरत का एक साथ टेंडर होगा। बल्क में खरीद से रेट 30-40% कम होगा।
  • 3-स्तरीय वेयरहाउस: देहरादून, हल्द्वानी और श्रीनगर में बड़े ड्रग वेयरहाउस, जहां से 48 घंटे में किसी भी अस्पताल में दवा पहुंचेगी।
  • टेक्नोलॉजी: e-Aushadhi सॉफ्टवेयर – हर अस्पताल में कितनी दवा बची, एक्सपायरी कब है, सब लाइव दिखेगा। जैसे ही स्टॉक 30% से नीचे आएगा, ऑटो-ऑर्डर।
  • उपकरण भी: केवल दवा ही नहीं, सर्जिकल उपकरण, इंप्लांट, ICU वेंटिलेटर, MRI मशीन के पार्ट्स भी यही कॉरपोरेशन खरीदेगा।

मरीज को सीधा फायदा:

  1. सरकारी अस्पताल में 90% दवाएं फ्री मिलना सुनिश्चित।
  2. बाहर से महंगी दवा खरीदने की मजबूरी खत्म।
  3. नकली और घटिया दवा पर रोक, क्योंकि क्वालिटी टेस्ट सेंट्रल लैब में होगा।

चुनौती: कॉरपोरेशन को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाना होगा। अगर खरीद में पारदर्शिता रही, तो ये उत्तराखंड के स्वास्थ्य इतिहास का सबसे बड़ा सुधार साबित होगा।

सहकारिता  नीति गांव की अर्थव्यवस्था को डिजिटल करेगी, और मेडिकल कॉरपोरेशन शहर के गरीब मरीज को बचाएगा। ये दोनों फैसले चुनावी नहीं, बल्कि सिस्टम को ठीक करने वाले हैं।